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लेख : पत्नी कहती थी जल्दी आना , मगर ये बात मुझे हजम नहीं होती। क्यों तो पढ़े पूरा लेख

जब भी मैं अपनी ड्यूटी के तैयार होता हु तो मेरी पत्नी मेरे से पहले तैयार मिलती है। अक्सर वह मुझे गाड़ी तक छोड़ने आती हैं और कहती हैं कि जल्दी आना ! गाड़ी तक छोड़ना तो ठीक है पर ” जल्दी आना “? मुझे कुछ हज़म होने जैसा लग नहीं रहा था । एक दिन मैंने बोल ही दिया , देखो मुझे ऐसे मत कहा करो | मैं तम्हारी हर बात मानता हूँ किसी दिन ये भी बात मान ली तो मैं चाहकर भी नहीं आ पाऊगां | बोली , ऐसा क्यू कह रहे हैं आप , मैंने कहा और क्या कहूं |

मैंने कहा तुम कहा करो कि सुरक्षित आना , इससे ये होगा कि एक तो मैं बिना जल्दबाजी के गाड़ी चला लूगां। दुसरा यातायात के नियमों का अच्छे से पालन कर पाऊगां और तुम्हारे पास सुरक्षित भी आ पाऊगां । उस दिन के बाद वो मुझे यही कहती हैं कि ” सुरक्षित आना ”!!!!

इससे मुझे ये भी आभास होता है कि मेरा परिवार मुझे कितना चाहता है और मेरी कितनी चिंता करता है इस लिए मुझे यातायात के सभी नियमों का दुरुस्त पालन करके , सुरक्षित घर पहुंचना मेरा कर्त्यव्य ही नहीं बल्कि मेरे परिवार के प्रति मेरा प्रेम भी जाहिर करता है । जब मैं पुलिस में प्रशिक्षण पर था तो मेरे एक प्रशिक्षक कहते थे कि ट्रेफिक रुलस सिर्फ दूसरों के लिए ही नही बने हैं , पुलिस के लिये भी ये ही रुलस है। कुछ भी हो नियमों का पालन तो हर हाल में करना ही चाहिए ।

NCRB की रिपोर्ट के अनुसार भारत में हर साल लगभग डेढ़ लाख के करीब लोग सड़क दुर्घटना में मरते हैं । सरकार दवारा कड़े नियम लागू करने के बाद भी कोई खास असर दिख नहीं रहा है । मेरे हिसाब से , जब भी कोई घर से कोई वाहन लेकर निकले तो उसे घर का कोई एक संदस्य ये जरूर कहने वाला हो कि सुरक्षित आना , न कि जल्दी आना , तो कुछ ना कुछ फर्क जरूर पड़ेगा ।

ये छोटे से दो शब्द बहुत लोगो की जिन्दगी बचा सकते हैं । साथ ही बहुत सारे परिवार उजड़ने भी बच सकते है। अगर आप लोगों ने मेरे इस छोटे से लेख को फोलो और फार्वर्ड किया तो मेरा भी इस लेख को लिखने का उददेश्य सफल हो जाएगा ।

सि . सुखबीर सिंह हरियाणा पुलिस गुरुग्राम

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चीन अपने गिरेबान में झाँके – क्यों कर रहा है धार्मिक अल्पसंख्यकों पर अत्याचार?

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चीन अपने अंदरूनी मामलों पर किसी देश को हस्तक्षेप नहीं करने देता, किन्तु दूसरे देशों के अंदरूनी मामलों में हस्तक्षेप करने में उसे कोई परहेज नहीं है। पाकिस्तान की शह पर चीन कश्मीर मामले को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में उछालने में कोई कसर नहीं छोड़ रहा। चीन जहाँ पाकिस्तान द्वारा फैलाये जा रहे दुष्प्रचार का समर्थन करता है, वहीं अपने ही देश के धार्मिक अल्पसंख्यकों का बर्बर दमन कर रहा है।

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चीन कई वर्षों से तिब्बती बौद्ध, वीगर मुस्लिम, हाउस क्रिस्चियन और फालुन गोंग साधना अभ्यासियों पर क्रूर अत्याचार कर रहा है। उनके अनुयायियों को गिरफ्तार कर लिया जाता है, कैद कर लिया जाता है, अत्याचार किया जाता है और अक्सर मार दिया जाता है। चीन में अरबों डॉलर का अवैध अंग व्यापार किया जा रहा है, जिसमें इन पीड़ित वर्गों के कैदियों की हत्या तक कर दी जाती है।

अंतर्राष्ट्रीय मीडिया में आये दिन चीनी कम्युनिस्ट पार्टी द्वारा धार्मिक अल्पसंख्यकों पर किये जा रहे अत्याचारों की खबरें छपती रहती हैं । इस लेख के द्वारा हम आपको बताना चाहते हैं कि हमारे लिए यह जानकारी क्यों प्रासंगिक है।


वीगर मुस्लिमों का दमन

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शिनजियांग प्रांत में चीनी प्रशासन और वहां के स्थानीय वीगर मुस्लिम समुदाय के बीच संघर्ष का बहुत पुराना इतिहास है। सांस्कृतिक और जनजातीय रूप से वे स्वयं को मध्य एशियाई देशों के नज़दीकी मानते हैं।

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कम्युनिस्ट चीन ने 1949 में इस क्षेत्र पर अतिक्रमण कर लिया, तभी से बीजिंग का लक्ष्य शिनजियांग को राजनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक रूप से एकीकृत करने और हान समुदाय को वहां बड़े पैमाने पर बसाने का रहा है। इस कारण वहां के वीगर निवासी अल्पसंख्यक बन गए।

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पिछले दशक के दौरान अधिकांश प्रमुख वीगर नेताओं को जेलों में ठूंस दिया जाता रहा या चरमपंथ के आरोप लगने के बाद वे विदेशों में शरण मांगने लगे। बीजिंग पर यह भी आरोप लगा कि इस इलाके में अपने दमन को सही ठहराने के लिए वो वीगर अलगवावादियों के ख़तरे को बढ़ा-चढ़ा कर पेश करता है।

यहां के मुसलमानों के प्रति रवैये के लिए चीन की दुनिया भर में खूब आलोचना हो रही है। संयुक्त राष्ट्र के अनुसार लगभग दस लाख वीगर मुसलमानों को री-एजुकेशन कैंप’ में रखा गया है जहाँ उन पर दमन किया जाता है। विश्व वीगर कांग्रेस की अध्यक्षा रेबिया कदीर के अनुसार शिनजियांग प्रान्त की राजधानी उरुम्ची को “यातना शिविर” में तब्दील कर दिया गया है। संयुक्त राष्ट्र की जिनेवा स्थित नस्ली भेदभाव उन्मूलन समिति ने कैदी वीगर नागरिकों को तत्काल रिहा करने की मांग की है।

फालुन गोंग साधना अभ्यास का दमन

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फालुन गोंग (जिसे फालुन दाफा भी कहा जाता है) बुद्ध और ताओ विचारधारा पर आधारित साधना अभ्यास है जो सत्य-करुणा-सहनशीलता के सिद्धांतों पर आधारित है। यह मन और शरीर की एक परिपूर्ण साधना पद्धति है जिसमें पांच सौम्य और प्रभावी व्यायामों का भी समावेश है, किन्तु बल मन की साधना या नैतिक गुण साधना पर दिया जाता है। फालुन गोंग की शुरुआत 1992 में श्री ली होंगज़ी द्वारा चीन की गयी। आज इसका अभ्यास दुनिया भर में, भारत सहित, 114 से अधिक देशों में किया जा रहा है।

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इसके स्वास्थ्य लाभ और आध्यात्मिक शिक्षाओं के कारण फालुन गोंग चीन में इतना लोकप्रिय हुआ कि 1999 तक करीब 7 से 10 करोड़ लोग इसका अभ्यास करने लगे। चीनी कम्युनिस्ट पार्टी की मेम्बरशिप उस समय 6 करोड़ ही थी। उस समय के चीनी शासक जियांग जेमिन ने फालुन गोंग की शांतिप्रिय प्रकृति के बावजूद इसे अपनी प्रभुसत्ता के लिए खतरा माना और 20 जुलाई 1999 को इस पर पाबंदी लगा कर कुछ ही महीनों में इसे जड़ से उखाड़ देने की मुहीम चला दी।

पिछले 20 वर्षों से फालुन गोंग अभ्यासियों को चीन में यातना, हत्या, ब्रेनवाश, कारावास, बलात्कार, जबरन मज़दूरी, दुष्प्रचार, निंदा, लूटपाट, और आर्थिक अभाव का सामना करना पड रहा है। अत्याचार की दायरा बहुत बड़ा है और मानवाधिकार संगठनों द्वारा दर्ज़ किए गए मामलों की संख्या दसियों हजारों में है।

तिब्बती लोगों का दमन

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राजनीतिक दृष्टि से तिब्बत कभी चीन का अंग नहीं रहा। माओ ज़े दोंग को तिब्बत के बिना कम्युनिस्ट चीन की आजादी अधूरी लगी। अंतत: 7 अक्तूबर, 1950 को चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी ने तिब्बत पर आक्रमण कर दिया और 1951 में तिब्बत को हड़प लिया।

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1956-1958 के दौरान तिब्बत में स्वतंत्रता के लिए कई संघर्ष हुए। 1959 तिब्बत के स्वतंत्रता इतिहास में बड़ा संघर्ष का वर्ष रहा। चीन ने स्वतंत्रता आन्दोलन को दबाने के लिए सभी हथकण्डे अपनाए। हजारों तिब्बतियों को पकड़कर चीन की जेलों में रखा गया। लगभग 60,000 तिब्बतियों का बलिदान हुआ। तिब्बत के बौद्ध धर्मगुरु दलाई लामा को रातों-रात निर्वासित हो कर भारत में शरण लेनी पड़ी।

1959-2019 तक अर्थात पिछले 60 वर्षों से चीनियों का तिब्बत में यह खूनी दमन चक्र निरन्तर चल रहा है। चीन दलाई लामा और उनके समर्थकों को अलगाववादी ठहराता है। चीन के ऊपर तिब्बत में धार्मिक दमन और वहाँ की संस्कृति के साथ छेड़-छाड़ का आरोप लगता रहता है। तिब्बत में आज भी भाषण, धर्म या प्रेस की स्वतंत्रता नहीं है और चीन की मनमानी जारी है।

हाउस क्रिस्चियन समुदाय पर दमन

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हाल के वर्षों में चीन में ईसाइयों की संख्या में तेज़ी से वृ​द्धि हुई है। एक अनुमान के मुताबिक़ चीन में 10 करोड़ ईसाई रहते हैं किन्तु इनमें से अधिकतर भूमिगत चर्चों (हाउस चर्च) में पूजा करते हैं। चीन की सरकार ईसाइयों को राज्य-स्वीकृत चर्चों में से किसी एक में शामिल होने के लिए दबाव डालती है, जो कम्युनिस्ट पार्टी की विचारधारा से सहमति रखते हैं।

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इन हाउस चर्चों पर नियंत्रण के लिए कम्युनिस्ट पार्टी लगातार कार्रवाई कर रही है। इसके तहत सैकड़ों चर्च तोड़ दिए गए। बाइबिल जला दी गईं। घरों में होली क्रॉस और जीसस की जगह राष्ट्रपति शी जिनपिंग के फोटो लगाने का आदेश जारी हुआ है। चीन की सरकार ने बाइबल की ऑनलाइन बिक्री पर भी प्रतिबंध लगा दिया है।

चीन में संगीन अंग प्रत्यारोपण अपराध

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पिछले कुछ वर्षों में चीन अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अंग प्रत्यारोपण के लिए पर्यटन केंद्र के रूप में उभरा है। आश्चर्यजनक यह है कि चीन में अंग प्रत्यारोपण की प्रतीक्षा अवधि बहुत कम है – केवल कुछ हफ्ते। जबकि दूसरे देशों में अनुकूल अंग मिलने में वर्षों लग जाते हैं। तो यह कैसे संभव है?

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यह अविश्वसनीय लगता है, किन्तु चीन में अंगों के प्रत्यारोपण के लिए अंग न केवल मृत्युदण्ड प्राप्त कैदियों से आते हैं, बल्कि बड़ी संख्या में कैद फालुन गोंग व अन्य धार्मिक अल्पसंख्यकों से आते हैं। चीन में मानवीय अंग प्रत्यारोपण के इस अपराध में बड़े पैमाने पर अवैध धन कमाया जा रहा है। चीन के अवैध मानवीय अंग प्रत्यारोपण उद्योग का सालाना कारोबार 1 बिलियन डॉलर का है।

स्वतंत्र जाँच द्वारा यह प्रकाश में आया है कि चीनी शासन, सरकारी अस्पतालों की मिलीभगत से, कैदियों के अवैध मानवीय अंग प्रत्यारोपण के अपराध में संग्लित है। इस अमानवीय कृत्य में हजारों फालुन गोंग अभ्यासियों की हत्या की जा चुकी है।

यह भारत के लिए प्रासंगिक क्यों है?

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पिछले कुछ समय से भारत और चीन के बीच संबंध तनावपूर्ण रहे हैं। भारत पर दबाव बनाने के लिये चीन मसूद अजहर समर्थन, अरुणाचल प्रदेश, डोकलाम, कश्मीर आदि का इस्तेमाल करता रहा है।किंतु चीन स्वयं आज एक दोराहे पर खड़ा है। एक ओर चीनी कम्युनिस्ट पार्टी है जिसका इतिहास झूठ, छल और धोखाधड़ी का रहा है। दूसरी ओर वहां लोकतंत्र और धर्मनिरपेक्षता की आवाजें उठ रही हैं। भले ही चीन आज एक महत्वपूर्ण आर्थिक शक्ति है और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का सदस्य है किंतु उसके नागरिक स्वतंत्र नहीं हैं।

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चीनी कम्युनिस्ट पार्टी की धारणाएं और नीतियां उन सभी चीजों का खंडन करती हैं जिनका भारत जैसी एक प्राचीन संस्कृति और आधुनिक लोकतंत्र प्रतिनिधित्व करता है। भारत के पास चीन को सिखाने के लिये बहुत कुछ है। भारत को चीन में हो रहे घोर मानवाधिकार हनन की निंदा करनी चाहिए। यही सोच भारत को विश्वगुरु का दर्जा दिला सकती है। हम भारत को मानवता के पक्ष का समर्थन करने और इतिहास के सही पक्ष में खड़ा होते देखने के लिए उत्सुक हैं।

President of
Falundafa Association of India
Suren Rao
9821381501

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शारीरिक और मानसिक रूप की चुनौती को फालुन दाफा करता है दूर।

  • फालुन दाफा की ओर आकर्षित हो रहे मुंबई के फैशन मॉडल्स 
  • मुंबई के फैशन मॉडल्स क्यों अपना रहे फालुन दाफा ध्यान अभ्यास?
  • मुंबई के फैशन मॉडल्स क्यों कर रहे अध्यात्म की तरफ रुख?

मुंबई फिल्म और फैशन जगत की मायानगरी है। देश भर के युवाओं को मॉडलिंग और फैशन की दुनिया बहुत आकर्षित करती है। ग्लैमर और चकाचोंध भरी इस दुनिया में कई युवा अपना संतुलन नहीं रख पाते और भटक जाते हैं, जबकि कुछ सकारात्मक समाधान खोजते हैं।


सुपर मॉडल पूजा मोर

मुंबई मॉडलिंग जगत में धाक जमाने के बाद न्यूयोर्क मे रह रहीं सुपर मॉडल पूजा मोर कहती हैं कि मॉडलिंग का पेशा शारीरिक और मानसिक रूप से बहुत चुनौतीपूर्ण है। इस पेशे में सफल होने के लिए जहाँ एक तरफ अनुशासन, मेहनत और धैर्य की आवश्यकता होती है वहीं दूसरी तरफ कड़ी प्रतिस्पर्धा, तनाव और अकेलेपन से भी जूझना पड़ता है। आइये हम मुंबई के मॉडलिंग और फैशन जगत से जुड़े कुछ युवाओं से जानते हैं कैसे फालुन दाफा ध्यान अभ्यास उन्हें मानसिक सयंम और स्वास्थ्य में मदद कर रहा है। 

पूजा मोर केल्विन क्लाईन, गिवेंची, रोबेर्टो कावाली, लुइ वित्तों जैसे लक्ज़री ब्रांड्स के लिए मॉडलिंग कर चुकी हैं और पिछले चार वर्षों से फालुन दाफा का अभ्यास रही हैं. उनका कहना है, “मैं सुबह का समय फालुन दाफा अभ्यास के लिए रखती हूँ। यह वह समय है जब मैं स्वयं से जुड़ पाती हूँ – अपने अंदर झांक पाती हूँ।“ 

पूजा बताती हैं कैसे फालुन दाफा ने उन्हें एक बेहतर इंसान बनाया और उनके प्रेरणा का स्रोत बना। “पहले कोई काम ठीक से न होने पर मैं दूसरों की गलती निकालती थी और उन पर दोष डालती थी। किन्तु अब मैं अपनी गलती स्वीकार कर पाती हूँ और सोचती हूँ कि अगली बार और बेहतर कैसे करूँ।“

फालुन दाफा मन और शरीर का एक प्राचीन साधना अभ्यास है जो सत्य-करुणा-सहनशीलता के सिद्धांतों पर आधारित है। इसमें पांच सौम्य और प्रभावी व्यायामों का भी समावेश है जो व्यक्ति के शरीर को शुद्ध करने, तनाव से राहत और आंतरिक शांति प्रदान करने में सहायता करते हैं।

मिस्टर इंडिया फाइनलिस्ट रह चुके अधिराज चक्रबर्ती मुंबई के एक प्रतिष्ठित मॉडल और उभरते हुए फैशन फोटोग्राफर हैं। अधिराज पहले बहुत गुस्सेबाज थे और बात बात में आपा खो बैठते थे। अधिराज बताते हैं, “फालुन दाफा के अभ्यास से मुझे अपने अन्दर और बाहर दोनो में ही बहुत बदलाव महसूस हुए। कोलकाता से मुंबई आने के बाद मेरा स्वास्थ्य ठीक नहीं रहता था। लेकिन अब मैं एनेर्जेटिक महसूस करता हूँ और रोजमर्रा की परिस्थितियों में संयम रख पाता हूँ।” 

फालुन दाफा का अभ्यास दुनियाभर में 114 से अधिक देशों में 10 करोड़ से अधिक लोगों द्वारा किया जा रहा है। लेकिन दुःख की बात यह है कि चीन, जो फालुन दाफा की जन्म भूमि है, वहां जुलाई 1999 से इसका दमन किया जा रहा है। चीन में हो रहे दमन के बारे में अधिराज कहते हैं, “यह बिलकुल अविश्वसनीय है कि इतने शांतिमय अभ्यास को भी चीन में क्रूर दमन का सामना करना पड़ रहा है। चीन को इस अभ्यास पर गर्व होना चाहिए कि कैसे यह दुनिया भर में करोड़ों लोगों के जीवन में बदलाव ला रहा है।” 

ऊटी में पली बढ़ी मोनिका थॉमस मुंबई की एक उभरती हुई युवा मॉडल हैं जो वोग, एल, हार्पर बाज़ार जैसी टॉप फैशन पत्रिकाओं के कवर की शोभा बढ़ा चुकी हैं. पिछले डेढ़ वर्ष से फालुन दाफा का अभ्यास कर रही मोनिका बताती हैं कि यह अभ्यास आरम्भ करते ही उन्हें मन और शरीर में सुखद बदलाव महसूस हुए। “फालुन दाफा से मैंने सीखा कि अपना काम करते हुए कैसे स्वयं में लगातार सुधार लाया जाये जो मुझे पहले नहीं मालूम था। अब मैं अपने विचारों और अपने आस-पास की परिस्थितियों को बेहतर तरीके से सम्भाल पाती हूँ।”

मुंबई की एक मॉडलिंग एजेंसी में मैनेजर, नेहा शाह, कहती हैं, “फालुन दाफा का अभ्यास कभी भी और कहीं भी किया जा सकता है, जो मेरी भागदोड़ वाली दिनचर्या के अनुकूल है। फालुन दाफा से न केवल मेरे स्वास्थ्य में सुधार आया है बल्कि मुझे अपने अन्दर देख पाने और अपनी कमियों को परखने की योग्यता मिली है, जिससे मैं किसी भी परिस्थिति में वस्तुओं को एक बड़े दायरे में देख पाती हूँ और शांत रह पाती हूँ।”   

फैशन जगत से जुड़े ये मॉडल्स अपने भागदोड़ और प्रतिस्पर्धा भरे जीवन में अध्यात्म की राह अपना कर सफलता के पायदान चढ़ रहे हैं। नि:संदेह आज की युवा पीढ़ी के लिए ये रोल मॉडल्स हैं। यदि आप भी फालुन दाफा सीखने के लिए इच्छुक हैं तो इसकी अधिक जानकारी www.falundafa.org या www.falundafaindia.org पर पा सकते हैं। फालुन दाफा पूरी तरह नि:शुल्क सिखाया जाता है। 

संपर्क
Archana
Coordinator FIC
Falundafa Association of India Bengaluru 9920093985

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हिंदी दिवस: सिर्फ ‘बेचारी’ बन कर रह गई है हिंदी ।


14 सितंबर 1949 को संविधान सभा ने एक मत से यह निर्णय लिया कि हिंदी ही भारत की राजभाषा होगी। इस निर्णय के बाद हिंदी को हर क्षेत्र में प्रसारित करने के लिए राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, वर्धा के अनुरोध पर 1953 से पूरे भारत में 14 सितंबर को हर साल हिंदी दिवस के रूप में मनाया जाने लगा।

हिंदी दिवस हर साल 14 सितंबर को मनाया जाता है। हिंदी विश्व की प्राचीन, समृद्ध और सरल भाषा है। यह भाषा भारत ही नहीं बल्कि दुनिया के कई देशों में बोली जाती है। इसे भारत में राजभाषा का दर्जा प्राप्त है। हिंदी भाषी लोगों की सबसे बड़ी संख्या भारत में है। 46 .13 फीसद के साथ 58 .0 करोड़ भारतीय हिंदी बोलते हैं। दुनिया की भाषाओं का इतिहास रखने वाली संस्था एथ्नोलॉग के मुताबिक हिंदी दुनिया में सबसे ज्यादा बोली जाने वाली तीसरी भाषा है।

वर्ष 1918 में महात्मा गांधी ने हिंदी साहित्य सम्मेलन में हिंदी भाषा को राजभाषा बनाने को कहा था। गांधी जी ने जनमानस की भाषा भी कहा था। बाद में 14 सितंबर 1949 को संविधान सभा ने निर्णय लिया था कि हिंदी ही भारत की राजभाषा होगी। इसी दिन भारतीय संविधान के भाग 17 के अध्याय की धारा 343 (1) में दर्शाया गया है कि संघ की राजभाषा हिंदी और लिपि देवनागरी होगी। चूंकि यह निर्णय 14 सितंबर को लिया गया था। इस कारण इस दिन को हिंदी दिवस के लिए काफी को श्रेष्ठ माना गया था। और वर्ष 1953 से पूरे भारत में इस दिन को हिंदी दिवस के रूप में मनाया जाने लगा


वैसे तो भारत में विभिन्न प्रकार की भाषाएं बोली जाती हैं। यहां हर राज्य की अपनी अलग सांस्कृतिक, राजनीतिक और ऐतिहासिक पहचान है। इसके बावजूद हिंदी भारत में सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषा है। यही वजह है कि राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने हिंदी को जनमानस की भाषा कहा था। उन्होंने 1918 में आयोजित हिंदी साहित्य सम्मेलन में हिंदी को राष्ट्र भाषा बनाने की बात कही थी।


इसे हिंदी की ही ताकत कहेंगे कि अब लगभग सभी विदेशी कंपनियां हिंदी को बढ़ावा दे रही हैं। यहां तक कि दुनिया के सबसे बड़े सर्च इंजन गूगल में पहले जहां अंग्रेजी को बढ़ावा दिया जाता था वहीं गूगल अब हिंदी को भी प्राथमिकता दे रहा है। हाल ही में ई-कॉमर्स साइट अमेजन इंडिया ने अपना हिंदी एप लांच किया है। ओएलएक्स, क्विकर जैसे प्लेटफॉर्म पहले ही हिंदी में उपलब्ध है। स्नैपडील जैसी ऑनलाइन शॉपिंग साइट भी हिंदी में है।

मगर इस सब के बाबजूद हिंदी भारत में सिर्फ एक बेचारी हिंदी बन कर रह गयी है। जहा हमें खुद को हिंदी भाषाई कहने पर गर्व होता है वही हिंदी सिर्फ कागजो में सिमट कर रह गई है।

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लेख: आप साथ देंगे तो पढ़ेगा इंडिया और बढ़ेगा इंडिया

सर्व शिक्षा अभियान क्या है?

सर्व शिक्षा अभियान भारत सरकार द्वारा शुरू की गई योजना है जिसका लक्ष्य देश के प्राइमरी स्कूलों (प्रारंभिक शिक्षा) के ढांचे को मजबूत बनाना है। देश का हर बच्चा प्राथमिक शिक्षा प्राप्त कर सके और अपने जीवन का विकास कर सके।

इस योजना के अनेक उद्देश्य हैं जैसे- बालक बालिका का अंतर समाप्त करना, देश के हर गांव शहर में प्राथमिक स्कूल खोलना और मुफ्त शिक्षा प्रदान करना, निशुल्क पाठ्य पुस्तकें, स्कूल ड्रेस देना, शिक्षकों का चयन करना, उन्हें लगातार प्रशिक्षण देते रहना, स्कूलों में अतिरिक्त कक्षा का निर्माण करना, पेयजल और प्रसाधन की व्यवस्था करना। सर्व शिक्षा अभियान एक विशिष्ट विकेंद्रित योजना है। इस योजना के लिए “स्कूल चले हम” नामक कविता बनाई गई थी जो बहुत लोकप्रिय हुई थी।

प्राथमिक शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए भारत सरकार ने ग्रामीण बच्चों के लिए 1 किलोमीटर की दूरी में प्राथमिक स्कूल खोले हैं और 3 किलोमीटर की दूरी में उच्च प्राथमिक स्कूल (कक्षा 1 से 8 तक) की सुविधाएं दी हैं, जिससे अनुसूचित जाति, जनजाति, पिछड़ा वर्ग के बच्चे भी स्कूलों में जा सके।

सर्व शिक्षा अभियान का केंद्रित क्षेत्र बालकों के साथ बालिकाओं को भी शिक्षा दिलाना है।
विशेष जरूरतमंद बच्चों को शिक्षित करना
समाज में बालक बालिका का अंतर समाप्त करना। माता पिता को बालिकाओं को भी स्कूल भेजने के लिए प्रोत्साहित करना।
देश की प्राथमिक शिक्षा की गुणवत्ता को सुधारना।
समाज के कमजोर वर्ग- अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, पिछड़े वर्ग के बच्चों को मुख्यधारा से जोड़ना। उन्हें भी शिक्षित कर सामुदायिक एकजुटता को बढ़ावा देना है ।

BRC (ब्लॉक रिसोर्स सेंटर)- यहां से प्राथमिक स्कूलों के लिए पाठ्य पुस्तकें वितरित की जाती हैं। इसके साथ ही ड्रेस जूते और दूसरे वस्तुएं भी वितरित की जाती हैं। प्रशासनिक कार्यों को संपन्न किया जाता है।

CRC (क्लस्टर रिसोर्स सेंटर)
नागरिक कार्य – यह सर्व शिक्षा अभियान का एक प्रमुख घटक है। इसके अंतर्गत कुल परियोजना के बजट का 33% तक निवेश किया जाता है।
निशुल्क पाठ्य पुस्तकें- प्राथमिक शिक्षा को प्रोत्साहन देने के लिए इस योजना में सभी बच्चों को निशुल्क पाठ्य पुस्तकें दी जाती हैं।

रिसर्च एंड डेवलपमेंट- सर्व शिक्षा अभियान के अंतर्गत दी जा रही शिक्षा का सतत मूल्यांकन, निगरानी, पर्यवेक्षण किया जाता है जिससे बच्चों को अच्छी शिक्षा मिले। अनुसंधान और मूल्यांकन के लिए हर स्कूल को 1500 रुपए की धनराशि दी जाती है। महिला साक्षरता (बालिकाओं की शिक्षा) पर विशेष निगरानी की जाती है। इसके साथ ही अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति पिछड़े वर्ग के बच्चों की शिक्षा पर विशेष निगरानी की जाती है। दृश्य पाठ्य सामग्री के लिए बच्चों को पोस्टर, चार्ट, स्केच पेन और दूसरी वस्तुएं दी जाती हैं।

विद्यालय अनुदान- इस परियोजना के लिए प्रत्येक स्कूल को 2000 रूपये का अनुदान दिया जाता है जिसे पुस्तकालय, स्कूल का सौंदर्यीकरण, मरम्मत का कार्य, फर्नीचर, संगीत वाद्य यंत्र और दूसरे खर्चों पर धनराशि खर्च की जाती है।

शिक्षक अनुदान- सर्व शिक्षा अभियान को प्रोत्साहित करने के लिए शिक्षकों को 500 रूपये का अनुदान दिया जाता है। 2007 2008 में 547590 से अधिक शिक्षक शिक्षकों को या अनुदान दिया गया था।

शिक्षक प्रशिक्षण- सर्व शिक्षा अभियान योजना को सफलतापूर्वक लागू करने के लिए शिक्षकों को प्रशिक्षित करना बहुत आवश्यक है। इसलिए नए पाठ्यक्रम के साथ प्रशिक्षण देना, परीक्षा सुधार, ग्रेडिंग प्रणाली, विशेष ध्यान योग्य बच्चों के लिए समावेशी शिक्षा का प्रशिक्षण भी दिया जाता है।

आपलोग खुद अपने आस पास सरकारी स्कूल में पता किजये सबकुछ ठीक चल रहा है या नहीं अगर ठीक नहीँ लगरहा तो तुरंत फ़ोटो या वीडियो बनाकर ये भी नहीं कर सकते तो एक शिकायत पत्र हेल्पिंग ह्यूमन झारखंड टीम को भेजये। फिर देखये पढ़ेगा इंडिया तो बढ़ेगा इंडिया का नारा बहुत ही धूमधाम से लगाएंगे।

आर्टिकल (लेख) सोर्स
आमिर नदीम अंसारी
स्टेट प्रेसिडेंट झारखंड
हेल्पिंग ह्यूमन एनजीओ