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लेख : पत्नी कहती थी जल्दी आना , मगर ये बात मुझे हजम नहीं होती। क्यों तो पढ़े पूरा लेख

जब भी मैं अपनी ड्यूटी के तैयार होता हु तो मेरी पत्नी मेरे से पहले तैयार मिलती है। अक्सर वह मुझे गाड़ी तक छोड़ने आती हैं और कहती हैं कि जल्दी आना ! गाड़ी तक छोड़ना तो ठीक है पर ” जल्दी आना “? मुझे कुछ हज़म होने जैसा लग नहीं रहा था । एक दिन मैंने बोल ही दिया , देखो मुझे ऐसे मत कहा करो | मैं तम्हारी हर बात मानता हूँ किसी दिन ये भी बात मान ली तो मैं चाहकर भी नहीं आ पाऊगां | बोली , ऐसा क्यू कह रहे हैं आप , मैंने कहा और क्या कहूं |

मैंने कहा तुम कहा करो कि सुरक्षित आना , इससे ये होगा कि एक तो मैं बिना जल्दबाजी के गाड़ी चला लूगां। दुसरा यातायात के नियमों का अच्छे से पालन कर पाऊगां और तुम्हारे पास सुरक्षित भी आ पाऊगां । उस दिन के बाद वो मुझे यही कहती हैं कि ” सुरक्षित आना ”!!!!

इससे मुझे ये भी आभास होता है कि मेरा परिवार मुझे कितना चाहता है और मेरी कितनी चिंता करता है इस लिए मुझे यातायात के सभी नियमों का दुरुस्त पालन करके , सुरक्षित घर पहुंचना मेरा कर्त्यव्य ही नहीं बल्कि मेरे परिवार के प्रति मेरा प्रेम भी जाहिर करता है । जब मैं पुलिस में प्रशिक्षण पर था तो मेरे एक प्रशिक्षक कहते थे कि ट्रेफिक रुलस सिर्फ दूसरों के लिए ही नही बने हैं , पुलिस के लिये भी ये ही रुलस है। कुछ भी हो नियमों का पालन तो हर हाल में करना ही चाहिए ।

NCRB की रिपोर्ट के अनुसार भारत में हर साल लगभग डेढ़ लाख के करीब लोग सड़क दुर्घटना में मरते हैं । सरकार दवारा कड़े नियम लागू करने के बाद भी कोई खास असर दिख नहीं रहा है । मेरे हिसाब से , जब भी कोई घर से कोई वाहन लेकर निकले तो उसे घर का कोई एक संदस्य ये जरूर कहने वाला हो कि सुरक्षित आना , न कि जल्दी आना , तो कुछ ना कुछ फर्क जरूर पड़ेगा ।

ये छोटे से दो शब्द बहुत लोगो की जिन्दगी बचा सकते हैं । साथ ही बहुत सारे परिवार उजड़ने भी बच सकते है। अगर आप लोगों ने मेरे इस छोटे से लेख को फोलो और फार्वर्ड किया तो मेरा भी इस लेख को लिखने का उददेश्य सफल हो जाएगा ।

सि . सुखबीर सिंह हरियाणा पुलिस गुरुग्राम

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चीन अपने गिरेबान में झाँके – क्यों कर रहा है धार्मिक अल्पसंख्यकों पर अत्याचार?

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चीन अपने अंदरूनी मामलों पर किसी देश को हस्तक्षेप नहीं करने देता, किन्तु दूसरे देशों के अंदरूनी मामलों में हस्तक्षेप करने में उसे कोई परहेज नहीं है। पाकिस्तान की शह पर चीन कश्मीर मामले को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में उछालने में कोई कसर नहीं छोड़ रहा। चीन जहाँ पाकिस्तान द्वारा फैलाये जा रहे दुष्प्रचार का समर्थन करता है, वहीं अपने ही देश के धार्मिक अल्पसंख्यकों का बर्बर दमन कर रहा है।

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चीन कई वर्षों से तिब्बती बौद्ध, वीगर मुस्लिम, हाउस क्रिस्चियन और फालुन गोंग साधना अभ्यासियों पर क्रूर अत्याचार कर रहा है। उनके अनुयायियों को गिरफ्तार कर लिया जाता है, कैद कर लिया जाता है, अत्याचार किया जाता है और अक्सर मार दिया जाता है। चीन में अरबों डॉलर का अवैध अंग व्यापार किया जा रहा है, जिसमें इन पीड़ित वर्गों के कैदियों की हत्या तक कर दी जाती है।

अंतर्राष्ट्रीय मीडिया में आये दिन चीनी कम्युनिस्ट पार्टी द्वारा धार्मिक अल्पसंख्यकों पर किये जा रहे अत्याचारों की खबरें छपती रहती हैं । इस लेख के द्वारा हम आपको बताना चाहते हैं कि हमारे लिए यह जानकारी क्यों प्रासंगिक है।


वीगर मुस्लिमों का दमन

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शिनजियांग प्रांत में चीनी प्रशासन और वहां के स्थानीय वीगर मुस्लिम समुदाय के बीच संघर्ष का बहुत पुराना इतिहास है। सांस्कृतिक और जनजातीय रूप से वे स्वयं को मध्य एशियाई देशों के नज़दीकी मानते हैं।

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कम्युनिस्ट चीन ने 1949 में इस क्षेत्र पर अतिक्रमण कर लिया, तभी से बीजिंग का लक्ष्य शिनजियांग को राजनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक रूप से एकीकृत करने और हान समुदाय को वहां बड़े पैमाने पर बसाने का रहा है। इस कारण वहां के वीगर निवासी अल्पसंख्यक बन गए।

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पिछले दशक के दौरान अधिकांश प्रमुख वीगर नेताओं को जेलों में ठूंस दिया जाता रहा या चरमपंथ के आरोप लगने के बाद वे विदेशों में शरण मांगने लगे। बीजिंग पर यह भी आरोप लगा कि इस इलाके में अपने दमन को सही ठहराने के लिए वो वीगर अलगवावादियों के ख़तरे को बढ़ा-चढ़ा कर पेश करता है।

यहां के मुसलमानों के प्रति रवैये के लिए चीन की दुनिया भर में खूब आलोचना हो रही है। संयुक्त राष्ट्र के अनुसार लगभग दस लाख वीगर मुसलमानों को री-एजुकेशन कैंप’ में रखा गया है जहाँ उन पर दमन किया जाता है। विश्व वीगर कांग्रेस की अध्यक्षा रेबिया कदीर के अनुसार शिनजियांग प्रान्त की राजधानी उरुम्ची को “यातना शिविर” में तब्दील कर दिया गया है। संयुक्त राष्ट्र की जिनेवा स्थित नस्ली भेदभाव उन्मूलन समिति ने कैदी वीगर नागरिकों को तत्काल रिहा करने की मांग की है।

फालुन गोंग साधना अभ्यास का दमन

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फालुन गोंग (जिसे फालुन दाफा भी कहा जाता है) बुद्ध और ताओ विचारधारा पर आधारित साधना अभ्यास है जो सत्य-करुणा-सहनशीलता के सिद्धांतों पर आधारित है। यह मन और शरीर की एक परिपूर्ण साधना पद्धति है जिसमें पांच सौम्य और प्रभावी व्यायामों का भी समावेश है, किन्तु बल मन की साधना या नैतिक गुण साधना पर दिया जाता है। फालुन गोंग की शुरुआत 1992 में श्री ली होंगज़ी द्वारा चीन की गयी। आज इसका अभ्यास दुनिया भर में, भारत सहित, 114 से अधिक देशों में किया जा रहा है।

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इसके स्वास्थ्य लाभ और आध्यात्मिक शिक्षाओं के कारण फालुन गोंग चीन में इतना लोकप्रिय हुआ कि 1999 तक करीब 7 से 10 करोड़ लोग इसका अभ्यास करने लगे। चीनी कम्युनिस्ट पार्टी की मेम्बरशिप उस समय 6 करोड़ ही थी। उस समय के चीनी शासक जियांग जेमिन ने फालुन गोंग की शांतिप्रिय प्रकृति के बावजूद इसे अपनी प्रभुसत्ता के लिए खतरा माना और 20 जुलाई 1999 को इस पर पाबंदी लगा कर कुछ ही महीनों में इसे जड़ से उखाड़ देने की मुहीम चला दी।

पिछले 20 वर्षों से फालुन गोंग अभ्यासियों को चीन में यातना, हत्या, ब्रेनवाश, कारावास, बलात्कार, जबरन मज़दूरी, दुष्प्रचार, निंदा, लूटपाट, और आर्थिक अभाव का सामना करना पड रहा है। अत्याचार की दायरा बहुत बड़ा है और मानवाधिकार संगठनों द्वारा दर्ज़ किए गए मामलों की संख्या दसियों हजारों में है।

तिब्बती लोगों का दमन

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राजनीतिक दृष्टि से तिब्बत कभी चीन का अंग नहीं रहा। माओ ज़े दोंग को तिब्बत के बिना कम्युनिस्ट चीन की आजादी अधूरी लगी। अंतत: 7 अक्तूबर, 1950 को चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी ने तिब्बत पर आक्रमण कर दिया और 1951 में तिब्बत को हड़प लिया।

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1956-1958 के दौरान तिब्बत में स्वतंत्रता के लिए कई संघर्ष हुए। 1959 तिब्बत के स्वतंत्रता इतिहास में बड़ा संघर्ष का वर्ष रहा। चीन ने स्वतंत्रता आन्दोलन को दबाने के लिए सभी हथकण्डे अपनाए। हजारों तिब्बतियों को पकड़कर चीन की जेलों में रखा गया। लगभग 60,000 तिब्बतियों का बलिदान हुआ। तिब्बत के बौद्ध धर्मगुरु दलाई लामा को रातों-रात निर्वासित हो कर भारत में शरण लेनी पड़ी।

1959-2019 तक अर्थात पिछले 60 वर्षों से चीनियों का तिब्बत में यह खूनी दमन चक्र निरन्तर चल रहा है। चीन दलाई लामा और उनके समर्थकों को अलगाववादी ठहराता है। चीन के ऊपर तिब्बत में धार्मिक दमन और वहाँ की संस्कृति के साथ छेड़-छाड़ का आरोप लगता रहता है। तिब्बत में आज भी भाषण, धर्म या प्रेस की स्वतंत्रता नहीं है और चीन की मनमानी जारी है।

हाउस क्रिस्चियन समुदाय पर दमन

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हाल के वर्षों में चीन में ईसाइयों की संख्या में तेज़ी से वृ​द्धि हुई है। एक अनुमान के मुताबिक़ चीन में 10 करोड़ ईसाई रहते हैं किन्तु इनमें से अधिकतर भूमिगत चर्चों (हाउस चर्च) में पूजा करते हैं। चीन की सरकार ईसाइयों को राज्य-स्वीकृत चर्चों में से किसी एक में शामिल होने के लिए दबाव डालती है, जो कम्युनिस्ट पार्टी की विचारधारा से सहमति रखते हैं।

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इन हाउस चर्चों पर नियंत्रण के लिए कम्युनिस्ट पार्टी लगातार कार्रवाई कर रही है। इसके तहत सैकड़ों चर्च तोड़ दिए गए। बाइबिल जला दी गईं। घरों में होली क्रॉस और जीसस की जगह राष्ट्रपति शी जिनपिंग के फोटो लगाने का आदेश जारी हुआ है। चीन की सरकार ने बाइबल की ऑनलाइन बिक्री पर भी प्रतिबंध लगा दिया है।

चीन में संगीन अंग प्रत्यारोपण अपराध

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पिछले कुछ वर्षों में चीन अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अंग प्रत्यारोपण के लिए पर्यटन केंद्र के रूप में उभरा है। आश्चर्यजनक यह है कि चीन में अंग प्रत्यारोपण की प्रतीक्षा अवधि बहुत कम है – केवल कुछ हफ्ते। जबकि दूसरे देशों में अनुकूल अंग मिलने में वर्षों लग जाते हैं। तो यह कैसे संभव है?

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यह अविश्वसनीय लगता है, किन्तु चीन में अंगों के प्रत्यारोपण के लिए अंग न केवल मृत्युदण्ड प्राप्त कैदियों से आते हैं, बल्कि बड़ी संख्या में कैद फालुन गोंग व अन्य धार्मिक अल्पसंख्यकों से आते हैं। चीन में मानवीय अंग प्रत्यारोपण के इस अपराध में बड़े पैमाने पर अवैध धन कमाया जा रहा है। चीन के अवैध मानवीय अंग प्रत्यारोपण उद्योग का सालाना कारोबार 1 बिलियन डॉलर का है।

स्वतंत्र जाँच द्वारा यह प्रकाश में आया है कि चीनी शासन, सरकारी अस्पतालों की मिलीभगत से, कैदियों के अवैध मानवीय अंग प्रत्यारोपण के अपराध में संग्लित है। इस अमानवीय कृत्य में हजारों फालुन गोंग अभ्यासियों की हत्या की जा चुकी है।

यह भारत के लिए प्रासंगिक क्यों है?

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पिछले कुछ समय से भारत और चीन के बीच संबंध तनावपूर्ण रहे हैं। भारत पर दबाव बनाने के लिये चीन मसूद अजहर समर्थन, अरुणाचल प्रदेश, डोकलाम, कश्मीर आदि का इस्तेमाल करता रहा है।किंतु चीन स्वयं आज एक दोराहे पर खड़ा है। एक ओर चीनी कम्युनिस्ट पार्टी है जिसका इतिहास झूठ, छल और धोखाधड़ी का रहा है। दूसरी ओर वहां लोकतंत्र और धर्मनिरपेक्षता की आवाजें उठ रही हैं। भले ही चीन आज एक महत्वपूर्ण आर्थिक शक्ति है और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का सदस्य है किंतु उसके नागरिक स्वतंत्र नहीं हैं।

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चीनी कम्युनिस्ट पार्टी की धारणाएं और नीतियां उन सभी चीजों का खंडन करती हैं जिनका भारत जैसी एक प्राचीन संस्कृति और आधुनिक लोकतंत्र प्रतिनिधित्व करता है। भारत के पास चीन को सिखाने के लिये बहुत कुछ है। भारत को चीन में हो रहे घोर मानवाधिकार हनन की निंदा करनी चाहिए। यही सोच भारत को विश्वगुरु का दर्जा दिला सकती है। हम भारत को मानवता के पक्ष का समर्थन करने और इतिहास के सही पक्ष में खड़ा होते देखने के लिए उत्सुक हैं।

President of
Falundafa Association of India
Suren Rao
9821381501

आवश्यकता है हेल्पिंग ह्यूमन न्यूज़ को पत्रकारों की निम्न नम्बर पर सम्पर्क करे 8218540275
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शारीरिक और मानसिक रूप की चुनौती को फालुन दाफा करता है दूर।

  • फालुन दाफा की ओर आकर्षित हो रहे मुंबई के फैशन मॉडल्स 
  • मुंबई के फैशन मॉडल्स क्यों अपना रहे फालुन दाफा ध्यान अभ्यास?
  • मुंबई के फैशन मॉडल्स क्यों कर रहे अध्यात्म की तरफ रुख?

मुंबई फिल्म और फैशन जगत की मायानगरी है। देश भर के युवाओं को मॉडलिंग और फैशन की दुनिया बहुत आकर्षित करती है। ग्लैमर और चकाचोंध भरी इस दुनिया में कई युवा अपना संतुलन नहीं रख पाते और भटक जाते हैं, जबकि कुछ सकारात्मक समाधान खोजते हैं।


सुपर मॉडल पूजा मोर

मुंबई मॉडलिंग जगत में धाक जमाने के बाद न्यूयोर्क मे रह रहीं सुपर मॉडल पूजा मोर कहती हैं कि मॉडलिंग का पेशा शारीरिक और मानसिक रूप से बहुत चुनौतीपूर्ण है। इस पेशे में सफल होने के लिए जहाँ एक तरफ अनुशासन, मेहनत और धैर्य की आवश्यकता होती है वहीं दूसरी तरफ कड़ी प्रतिस्पर्धा, तनाव और अकेलेपन से भी जूझना पड़ता है। आइये हम मुंबई के मॉडलिंग और फैशन जगत से जुड़े कुछ युवाओं से जानते हैं कैसे फालुन दाफा ध्यान अभ्यास उन्हें मानसिक सयंम और स्वास्थ्य में मदद कर रहा है। 

पूजा मोर केल्विन क्लाईन, गिवेंची, रोबेर्टो कावाली, लुइ वित्तों जैसे लक्ज़री ब्रांड्स के लिए मॉडलिंग कर चुकी हैं और पिछले चार वर्षों से फालुन दाफा का अभ्यास रही हैं. उनका कहना है, “मैं सुबह का समय फालुन दाफा अभ्यास के लिए रखती हूँ। यह वह समय है जब मैं स्वयं से जुड़ पाती हूँ – अपने अंदर झांक पाती हूँ।“ 

पूजा बताती हैं कैसे फालुन दाफा ने उन्हें एक बेहतर इंसान बनाया और उनके प्रेरणा का स्रोत बना। “पहले कोई काम ठीक से न होने पर मैं दूसरों की गलती निकालती थी और उन पर दोष डालती थी। किन्तु अब मैं अपनी गलती स्वीकार कर पाती हूँ और सोचती हूँ कि अगली बार और बेहतर कैसे करूँ।“

फालुन दाफा मन और शरीर का एक प्राचीन साधना अभ्यास है जो सत्य-करुणा-सहनशीलता के सिद्धांतों पर आधारित है। इसमें पांच सौम्य और प्रभावी व्यायामों का भी समावेश है जो व्यक्ति के शरीर को शुद्ध करने, तनाव से राहत और आंतरिक शांति प्रदान करने में सहायता करते हैं।

मिस्टर इंडिया फाइनलिस्ट रह चुके अधिराज चक्रबर्ती मुंबई के एक प्रतिष्ठित मॉडल और उभरते हुए फैशन फोटोग्राफर हैं। अधिराज पहले बहुत गुस्सेबाज थे और बात बात में आपा खो बैठते थे। अधिराज बताते हैं, “फालुन दाफा के अभ्यास से मुझे अपने अन्दर और बाहर दोनो में ही बहुत बदलाव महसूस हुए। कोलकाता से मुंबई आने के बाद मेरा स्वास्थ्य ठीक नहीं रहता था। लेकिन अब मैं एनेर्जेटिक महसूस करता हूँ और रोजमर्रा की परिस्थितियों में संयम रख पाता हूँ।” 

फालुन दाफा का अभ्यास दुनियाभर में 114 से अधिक देशों में 10 करोड़ से अधिक लोगों द्वारा किया जा रहा है। लेकिन दुःख की बात यह है कि चीन, जो फालुन दाफा की जन्म भूमि है, वहां जुलाई 1999 से इसका दमन किया जा रहा है। चीन में हो रहे दमन के बारे में अधिराज कहते हैं, “यह बिलकुल अविश्वसनीय है कि इतने शांतिमय अभ्यास को भी चीन में क्रूर दमन का सामना करना पड़ रहा है। चीन को इस अभ्यास पर गर्व होना चाहिए कि कैसे यह दुनिया भर में करोड़ों लोगों के जीवन में बदलाव ला रहा है।” 

ऊटी में पली बढ़ी मोनिका थॉमस मुंबई की एक उभरती हुई युवा मॉडल हैं जो वोग, एल, हार्पर बाज़ार जैसी टॉप फैशन पत्रिकाओं के कवर की शोभा बढ़ा चुकी हैं. पिछले डेढ़ वर्ष से फालुन दाफा का अभ्यास कर रही मोनिका बताती हैं कि यह अभ्यास आरम्भ करते ही उन्हें मन और शरीर में सुखद बदलाव महसूस हुए। “फालुन दाफा से मैंने सीखा कि अपना काम करते हुए कैसे स्वयं में लगातार सुधार लाया जाये जो मुझे पहले नहीं मालूम था। अब मैं अपने विचारों और अपने आस-पास की परिस्थितियों को बेहतर तरीके से सम्भाल पाती हूँ।”

मुंबई की एक मॉडलिंग एजेंसी में मैनेजर, नेहा शाह, कहती हैं, “फालुन दाफा का अभ्यास कभी भी और कहीं भी किया जा सकता है, जो मेरी भागदोड़ वाली दिनचर्या के अनुकूल है। फालुन दाफा से न केवल मेरे स्वास्थ्य में सुधार आया है बल्कि मुझे अपने अन्दर देख पाने और अपनी कमियों को परखने की योग्यता मिली है, जिससे मैं किसी भी परिस्थिति में वस्तुओं को एक बड़े दायरे में देख पाती हूँ और शांत रह पाती हूँ।”   

फैशन जगत से जुड़े ये मॉडल्स अपने भागदोड़ और प्रतिस्पर्धा भरे जीवन में अध्यात्म की राह अपना कर सफलता के पायदान चढ़ रहे हैं। नि:संदेह आज की युवा पीढ़ी के लिए ये रोल मॉडल्स हैं। यदि आप भी फालुन दाफा सीखने के लिए इच्छुक हैं तो इसकी अधिक जानकारी www.falundafa.org या www.falundafaindia.org पर पा सकते हैं। फालुन दाफा पूरी तरह नि:शुल्क सिखाया जाता है। 

संपर्क
Archana
Coordinator FIC
Falundafa Association of India Bengaluru 9920093985

रमणिका गुप्ता का जाना एक हादसा है वो और जीना चाहती।

लंबे समय से बीमार रही रमणिका गुप्ता का निधन हो गया। उनकी बीमारी की हालत में मैं उनसे कई बार मिलने गया और यह महसूस होता था कि वह और जीना चाह रही हैं। थोड़ा बहुत भी ठीक होती तो भि‍ड़ जाती अपने कामों में, समय पर मैगजीन युद्ध रत आम आदमी आना है।

कौन सा काम कैसा  हो रहा है? एक तरह से उन्हें अपने जाने का भी एहसास हो चुका था। क्योंकि उमर उनकी काफी हो रही थी। वह अपने तमाम राइटिंग्स और स्पीच को इकट्ठा कर रही थी। इसके प्रकाशित करने की तैयारी में थी।

शायद वह अब तक प्रकाशित भी हो गई होगी ।बहुत सारे काम वे जल्‍दबाजी में करना चाह रही थी। हर जगह वह आप अपनी उपस्थिति देना चाहती थी। बता दूं कि रमणिका गुप्ता ने अपने कैरियर की शुरुआत हजारीबाग बिहार।

अब झारखंड में है, से शुरू की थी। परिवार से विद्रोह करते हुए उन्होंने कोयला मजदूरों के लिए आंदोलन जारी रखा और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी मार्क्सवादी से वह विधायक चुनी गई। उनके जज्बे और साहस की हमेशा तारीफ में होती थी।

इसके साथ साथ उन्होंने अपना साहित्यिक काम भी जारी रखा। वह हजारीबाग से ही युद्ध रात आम आदमी पत्रिका निकालती थी। शुरू में यह त्रैमासिक थी ।उन्हें अपने नाम का बेहद मोह था जैसा कि सभी को होता है। लेकिन वह उसे प्रजेंट करने में कभी भी संकोच नहीं करती थी।

उन्होंने अपने जीते जी रमणिका फाउंडेशन बनाया और खुद उसकी संस्थापक सदस्य बनी। रमणिका फाउंडेशन के मार्फत वे कई विधाओं में पुरस्कार भी दिया करती थी। पत्रिका का प्रकाशन भी रमणिका फाउंडेशन के माध्यम से ही होता था।

उन्होंने आदिवासी मुद्दों पर जमकर लिखा और इस पर लिखने वालों को आगे भी बढ़ाए। इसी प्रकार वे दलित मुद्दों पर भी काफी लिखा करती थी और दलित लेखकों को प्रमोट करने का श्रेय उन्हें जाता है। उनकी कविताएं और कहानियां चर्चित रही हैं खासकर उन की एक कहानी बहू जुठाई बेहद चर्चित रही है।

यदि मौका मिले तो आप इस कहानी को जरूर पढ़ें।वे स्त्री मुद्दों को उठाने वाली देश की अग्रणी महिलाओं में शुमार की जाती थी । उनकी तमाम रचनाओं में महिला वादी सोच स्पष्ट दिखाई पड़ती थी। उनकी आत्मकथा हादसे बेहद चर्चित रही।

उन्होंने अपने अंतरंग संबंधों और तमाम अनुभवों को इस आत्मकथा में साझा किया था। जिसके कारण वह विवादों में भी घिरी थी।मेरा जब भी दिल्ली जाना होता मैं रमणिका जी के पास जरूर आता और प्रभावित था कि वे एक बुजुर्ग महिला होने के बावजूद बेहद सक्रिय थी। रात को केवल 4 या 5 घंटे सोती, बाकी समय लिखने पढ़ने में जाता।

उनकी पत्रिका का विशेषांक मल मूत्र ढोता भारत के लिए। मैं कई बार दिल्ली गया और इस काम में मैंने मदद की। इसके बाद मैंने पिछड़ा वर्ग विशेषांक संपादन का जिम्मा लिया और क़रीब 4 साल की मेहनत के बाद यह अंक मार्केट में आया। इस बीच मुझे कई बार रायपुर से दिल्ली का दौरा करना पड़ा। तमाम लोगों से इंटरव्यू एवं आलेख मंगाए गए।

रचनाओं की छटनी और प्रूफ चेकिंग। एक बहुत बड़ा काम था। यह अंक दो भागों में प्रकाशित हुआ। एक बार की घटना मुझे याद आ रही है रमणिका जी को जब पता चलता कि कोई दिल्‍ली के बाहर से लेखक या लेखिका आई हैं। तो उन्हें फोन कर बुला लेती और गपशप मारते हैं। कुछ लिखना पढ़ना होता। इसी दरमियान कंवल भारती जी को उन्होंने फोन पर बुलवाया और उन्होंने कहा कि भारती जी अब आप आ जाइए शाम का खाना खाएंगे कुछ रम शम पिएंगे।

कंवल भारती जी ऑटो में तुरंत डिफेंस कॉलोनी स्थित रमणिका जी के निवास पर आ गए। एक-दो दिन पहले से मैं भी वहां पर था। जैसे ही कंवल भारती आए तो उन्होंने स्वागत सत्कार किया और बातचीत करने लगे। कंवल भारती जी ने कहा कि आपने मंगवा लिए (इशारा रम की तरफ था) तो रमणिका जी तुरंत कहने लगी कि नहीं हम तो आजकल लेना बंद कर दिए हैं और यहां पर पिलाना भी बंद हैं। तो कंवल भारती जी तमक गए बोले कि आप ने मुझे बुलाया है, यही बोल कर, इसलिए मैं आया हूं । सहमति के लिए रमणिका जी ने मुझसे हामी भराने की कोशिश की, तो मैंने कहा कि आपने तो कहा था कि आइए कुछ रम सम पिएंगे।

रमणिका जी ने कहा कि ऐसा तो मैंने नहीं कहा था। उसके तुरंत बाद कंवल भारती जी नाराज हो कर चले गए। वह कई बार अपने कहे बातों को बदल दिया करती थी और कभी भी अचानक बहुत पैसे वाली हो जाती। तो कभी वे बिल्कुल गरीबों से व्यवहार करती। वह अक्सर कहां करती थी कि मेरे बेटे की कंपनी( जो अमेरिका में है) का टर्नओवर बिहार सरकार के टर्नओवर से ज्यादा है।

उनका यह फाउंडेशन उन्हीं की मदद से चल रहा है। उनके यहां जो कर्मचारी काम करते थे उनमें से एक दिनेश को छोड़कर कोई भी कर्मचारी साल 6 महीना से ज्यादा नहीं टिक पाता था। वे रगड़ कर काम लेती थी और किसी भी कर्मचारी को फांके मानने का मौका नहीं देती थी। इसलिए संपादक से लेकर टायपिस्ट टिक नही पाते।कोई कर्मचारी यदि उनके टेलीफोन से अपने रिश्तेदारों से फोन भी करता तो वह उनकी सैलरी से फोन के बिल के पैसे काट लिया करती।

प्रोफेशनल तो इतनी थी कि आप अंदाजा नहीं लगा सकते। यदि आप जानेंगे कि वे एक दलित आदिवासी और महिला वादी महिला थी। लेकिन इमोशनल तो बिल्कुल भी नहीं थी। कई बार उनके महिला वादी होने पर भी संदेह होता।ऐसा ही एक वाक्‍या मुझे याद आ रहा है। 

एक नेपाली जोड़ा उनके यहां निवास करता था। उसकी पत्नी घर पर झाड़ू पोछा खाना वगैरह बनाने का काम करती थी और पति कहीं किसी कंपनी में चौकीदार था। इसी दरमियान बता दूं मैं की झारखंड हजारीबाग निवासी रमणिका जी के पुराने मित्र का बेटा आईएएस परीक्षा की तैयारी करने के लिए रमणिका का फाउंडेशन में साल भर से ठहरा हुआ था। नाम तो मुझे याद नहीं आ रहा है। लेकिन वह भूमिहार परिवार का था ऐसी जानकारी रमणिका जी ने दी थी।

वह लड़का पढ़ाई कम और हीरोगिरी ज्यादा करता था। अक्सर रमणिका फाउंडेशन में आने वाली महिलाओं के पीछे पीछे घूमता रहता और नेपाल से आए उस नेपाली चौकीदार की पत्नी के भी पीछे-पीछे वह घूमा करता था। बाद में पता चला कि इस लड़के ने उस नेपाली महिला के साथ धमकी देकर जबरदस्ती संबंध बनाया और वह महिला प्रेग्नेंट हो गई।

यह जानकारी  उस नेपाली महिला के पति को नहीं हो पाई। क्योंकि वह आधी रात चौकीदारी की ड्यूटी से फाउंडेशन में आकर रुकता था यहां के एक छोटे से कमरे में नेपाली जोड़े को निवास हेतु जगह दिया गया था।  रमणिका फाउंडेशन में हंगामा मच गया। जैसा की होना चाहिए था।

इस मामले में रमणिका जी के द्वारा पुलिस में रिपोर्ट लिखा जाना चाहिए था। लेकिन हुआ इसके उलट, वह महिला लगातार रोती रही और पुलिस में जाने की कोशिश करती रही। लेकिन रमणिका जी ने उन्हें डांट कर रोका और उस मामले मैं लीपापोती कर के उसे रफा-दफा कर दिया गया।

एक प्रकार से रमणिका जी ने उस भूमिहार बलात्कारी लड़के को बचाने की पूरी कोशिश की जिसमें वह पूरी तरह सफल हो गई। उनके इस व्यवहार से उनके महिला वादी होने पर संदेह होता रहा है मुझे। मैं नहीं समझ पाया कि वह अपने लिखने, कहने और विचारधारा के उलट कैसे व्‍यवहार कर सकती हैं।जैसा कि मैंने पहले बताया है कि वह फ्रंट में रहने के लिए कुछ भी किया करती।

एक बार उन्होंने मुझे फोन किया संजीव जी आमिर खान से संपर्क करो। उन्होंने जो सत्य में जयते पर सफाई कामगारों के लिए एपिसोड बनाया है। उसमें मुझे भी ले ले मैंने भी तो मल मूत्र ढोता भारत पत्रिका विशेषांक निकाला था। इस तरह वे अपने असिस्टेंट उसे फोन करवाती। जिस पर में उन्हें कोई संकोच नहीं था।

वह किसी भी संपादक को यदि लेख भेजती, तो उन्हें फोन जरूर करवाती है। जैसे उन्होंने यदि 10 संपादकों को लेख भेजा है। तो अपने असिस्टेंट से उन्हें फोन करने के लिए कहती है और वे स्वयं बात करती।

वे जिस प्रकार लाल सलाम बोलने में संकोच नहीं करती थी ठीक उसी प्रकार वह जय भीम बोलने में भी संकोच नहीं करती थी। डॉक्टर अंबेडकर के द्वारा किए गए प्रयासों को वह खुले दिल से स्वीकार करती थी और उन्हें मंचों पर साझा भी करती । सक्रियता उनकी सबसे बड़ी खूबी रही है वह बेहद प्रोफेशनल और सक्रिय महिला थी।

मौत के कुछ दिनों पहले भी वह मंचों पर देखी गई और जज्बे के साथ अपने बातों को भी रखती थी। उनका जाना निश्चित रूप से साहित्य और विचारधारा की दुनिया में एक बड़ी खाई है जिसकी क्षतिपूर्ति आसान नहीं है।

– संजीव खुदशाह

जानिए कितना बहुमूल्य है आपका वोट

भारत के ग्रामीण मतदाताओं में वोट के प्रति जागरूकता शहरी मतदाताओं के वनिस्पत कुछ ज्यादा होती है। आंकड़े बताते हैं कि ग्रामीण क्षेत्रों में मतदान का प्रतिशत ज्यादा होता है और शहर के क्षेत्रों में मतदान का प्रतिशत कम होता है। इसके कुछ कारण है, शहरी मतदाता पढ़ा लिखा सक्षम होने के बावजूद कुछ भ्रम पाले हुए रहता है। जिसके कारण वह वोट डालने नहीं जाता है आइए जाने वह कौन कौन सी वजह है।

1. शहरी मतदाता यह जो जानता है की उसका वोट बहुमूल्‍य है लेकिन वह यह सोचता है कि यह वोट उसी को दूँगा जो पर्सनली उसके पास मिलने के लिए आएगा अन्यथा मैं वोट किसी को नहीं दूंगा। यह अभिमान शहरी मतदाताओं में होता है।

2. उसे यह भ्रम होता है कि- मैंने अगर वोट नहीं दिया तो क्या होगा ? सभी लोग वोट देंगे मेरे एक वोट से कुछ होने जाने वाला नहीं है।

3. कई बार उसकी सोच रहती है कि – उस दिन डिसाइड करेंगे वोट देना है या नहीं। समय मिला तो वोट देंगे नहीं मिला तो नहीं देंगे। आलस्य के भावना।

4. कुछ उल्‍झन का बहाना होता है जैसे- मुझे मालूम नहीं है कहां पर वोट देने जाना है। मतदाता सूची में मेरा नाम है या नहीं?

5. कभी वह अहंकारी हो जाता है सोचता है कि – वोट देने चला भी जाऊंगा तो मेरे जैसा व्यक्ति जिंदगी में कभी भी लाइन में खड़ा नहीं हुआ है। मैं लाइन में क्यों खड़े हो ऊंगा।

6. संकोच करता है – मुझे किससे पूछना है कि मेरा मतदान केंद्र कहां पर है। सूची में कहां पर मेरा नाम है। इसके संकोच के कारण शहरी लोग वोट देने नहीं जा पाते हैं।

जबकि मतदान संबंधी पूरी जानकारी चुनाव आयुक्‍त द्वारा इस वेबसाइट में मुहैया कराई गई है कोई भी व्‍यक्ति अपने नाम मतदान केन्‍द्र वोटर आई डी की जानकारी आसानी से ले सकता है1

पूरे देश के किसी भी राज्‍य के लिए https://eci.nic.in/eci_main1/Linkto_erollpdf.aspx,

इन तमाम कारणों से वह वोट देने नहीं जाता है। और फिर बाकी के 5 साल कोसता रहता है अपने ही प्रतिनिधियों को, कि वह फलां काम नहीं करते हैं। उन्होंने यह काम गलत किया है। और ऐसा होना चाहिए था। गलत आदमी चुना गया। जबकि वह स्‍वयं वोट न देकर अपनी जिम्‍मदारी नही निभाता है।

राजनीतिक पार्टी शहरी मतदाताओं को प्रेरित करने में उदासीनता

ज्यादातर ऐसा माना जाता है कि शहरी पढ़ा लिखा मतदाता अपने विवेक और ज्ञान का प्रयोग करके मत दान देते हैं। और किसी भी लालच जैसे दारू साड़ी कपड़ा आदि में ना आकर विवेक के आधार पर वोट देना पसंद करते हैं। इस कारण राजनीतिक पार्टियां शहरी मतदाताओं को वोट डालने के लिए ज्यादा प्रेरित नहीं करती है। क्योंकि ग्रामीण मतदाताओं के वनिस्पत शहरी मतदाताओं के पास उम्मीदवारों के संबंध में ज्यादा जानकारी होती है।

शहरी मतदाताओं में अवेयरनेस जागरूकता की कमी

ज्यादातर यह माना जाता है कि शहरी मतदाता जागरूक होता है। लेकिन सोशल मामलों में या कहें मतदान के मामलों में शहरी मतदाताओं में अवेयरनेस की कमी होती है। ज्यादातर पॉश इलाकों में मतदान का प्रतिशत बेहद कम होता है, जहां पर बुद्धिमान और रसूख वाले लोग बसते हैं। वहीं दूसरी ओर शहर के ही स्लम और झुग्गी झोपड़ी वाले एरिया में मतदान का प्रतिशत अधिक होता है।

चुनाव आयुक्‍त जागरूकता मुहिम

चुनाव आयुक्‍त के द्वारा मतदान के प्रति मतदाता की रूची बढाने के लिए विज्ञापन फलैक्‍स नुक्‍कड नाटक रैली का प्रयोग किया जा रहा है, और मतदान हेतु प्रेरीत करने में कोई कसर नही छोड़ी जा रही  है।

आपका एक वोट क्या क्या कर सकता है

कुछ मतदाता यह समझते हैं कि उनके एक वोट देने नहीं देने से क्या फर्क पड़ेगा। दरअसल उनका एक वोट जितने उम्मीदवार खड़े हैं। उन सभी को प्रभावित करता है। मान लीजिए 15 उम्मीदवार हैं। तो आपका एक वोट जिसे आप दे रहे हैं उसे आगे बढ़ाए गा और इतनी ही संख्या में वोट बाकी  उम्मीदवारों से कम हो जाएंगे। क्‍योकि वोट की संख्‍या निश्चित होती है।

आपने अपना वोट नहीं दिया तो क्या होगा

यदि आपने अपना वोट नहीं दिया है तो एक गलत उम्मीदवार चुना जा सकता है। एक अच्छा उम्मीदवार चुनने से महरूम हो सकता है। योग्‍य उम्‍मीदवार आपकी समस्‍याओं को समझ सकता है, जनहीत के मुद्दो को शासन के समक्ष उठा सकता है। वहीं यदि कोई भ्रष्‍ट उम्‍मीदवार विजयी होता है तो वह जन विरोधी  कार्य करेगा, जनता को आपस में लड़वायेगा, दंगे करवायेगा, जनता द्वारा जमा किये टैक्‍स के पैसे का दुरुपयोग करेगा, अपन घर भरेगा। यदि आप अपना वोट नोटा को भी देते हैं तो भी यह संदेश जाता है कि मौजूदा उम्मीदवारों में से कोई भी आपको पसंद नहीं है। लोकतंत्र में आपको हर प्रकार से अपनी बात को रखने का मौका मिलता है और वोटिंग या चुनाव प्रथा लोकतंत्र की जड़ों को मजबूत करती है।

भारत का लोकतांत्रिक इतिहास इस बात का गवाह है कि जब जब पढ़ा-लिखा और समझदार मतदाता मत डालने के लिए भारी संख्या में निकलता है तो लोकतंत्र में अप्रत्याशित परिणाम आते हैं। आईये हम भारत के एक एक मतदाता यह सुनिश्चि‍त करे की वे अपना वोट जरूर दे और भारतीय लोकतंत्र को मज़बूती प्रदान करे।

– संजीव खुदशाह

भारत-मुकुट थे डाॅ. लोहिया


(12 अक्तूबर) डाॅ. राममनोहर लोहिया की 51 वीं पुण्य-तिथि थी। 1967 में जब दिल्ली के विलिंगडन अस्पताल में वे बीमार थे, मैं वहां रोजाना जाया करता था। उन्हें देखने के लिए जयप्रकाश नारायण, इंदिरा गांधी, जाकिर हुसैन, मोरारजी देसाई और कौन-कौन नहीं आता था ?

राजनारायणजी तो पास के एक कमरे में ही रहने लगे थे। मैं भी आखिरी तीन-चार दिन अस्पताल के सामने बने 216 और 218 नार्थ ऐवन्यू के श्री अर्जुनसिंह भदौरिया और जाॅर्ज फर्नाडींस के फ्लेट में रहा था।

7 गुरुद्वारा रकाबगंज से जब 57 वर्षीय डाॅ. लोहिया की शव-यात्रा निकली तो देश के सैकड़ों राजनीतिक और बौद्धिक लोग उनके पीछे-पीछे चल रहे थे लेकिन देखिए भारत की राजनीति का दुर्भाग्य कि आज की नई पीढ़ी उनका नाम तक नहीं जानती। 


मैं समझता हूं कि 20 वीं सदी के भारत में लोहिया से बढ़कर कोई राजनीतिक चिंतक नहीं हुआ। वे अपने आप को ‘कुजात गांधीवादी’ कहते थे और कांग्रेसियों को ‘मठी गांधीवादी’।

उनके विचारों में इतनी शक्ति थी कि सिर्फ उनके दम पर उन्होंने जवाहरलाल नेहरु का दम फुला दिया था और 1967 में भारत के कई प्रांतों में गैर-कांग्रेसी सरकारें खड़ी कर दी थीं।

मैंने 1961 या 62 में अपने इंदौर के क्रिश्चियन काॅलेज में उन्हें व्याख्यान के लिए आमंत्रित किया था। प्राचार्य डाॅ. डेविड इतने नाराज हुए थे कि वे तीन दिन की छुट्टी पर चले गए थे।

डाॅ. लोहिया जहां भी जाते, वे नौजवानों को अन्याय, असमानता, अंधविश्वास और संकीर्णता के खिलाफ लड़ना सिखाते थे। उनकी सप्तक्रांति की धारणा में जात तोड़ो, अंग्रेजी हटाओ, दाम बांधो, नर-नारी समता, विश्व-सरकार, भारत-पाक एका जैसे विचार होते थे।

वे गांधीजी की अहिंसा और सिविल नाफरमानी (सविनय अवज्ञा) में विश्वास करते थे। उनके विचारों से दीनदयाल उपाध्याय और अटलबिहारी वाजपेयी भी गहरे में प्रभावित थे। दीनदयाल शोध संस्थान ने मेरे कहने पर ‘गांधी, लोहिया, दीनदयाल’ नामक पुस्तक भी प्रकाशित की थी।

लोहिया के व्यक्तित्व और विचारों में इतनी प्रेरक-शक्ति थी कि मेरे-जैसे कई नौजवानों ने उस समय कई सत्याग्रहों का नेतृत्व किया और कई बार जेल काटी। वर्तमान राजनीतिक दल और नेता वैचारिक दृष्टि से अत्यंत गरीब हैं। न तो उनके पास कोई दृष्टि है न दिशा है।

यदि सरकार लोहिया-साहित्य को छापकर करोड़ों की संख्या में नौजवानों को सस्ते में उपलब्ध करवाए तो देश का बड़ा कल्याण होगा। जहां तक भारत-रत्न का सवाल है, कुछ मित्रों का आग्रह है कि वह लोहियाजी को दिया जाए।

जरुर दिया जाए लेकिन मैं मानता हूं कि उनका व्यक्तित्व और कृतित्व कई भारत-रत्नों से कहीं ऊंचा और बेहतर था। वे ऐसे भारत-मुुकुट थे, जिसमें कई भारत-रत्नों को सुशोभित किया जा सकता है।

– डॉ. वेदप्रताप वैदिक

जनता को स्वास्थ का अधिकार है?

संविधान के आर्टिकल 21 में हमे जीने का अधिकार दिया गया है l
लेकिन इस जीने के अधिकार के क्या मायने हैं?


संविधान का ये आर्टिकल ये कहता है कि, कानून के तय किए गए नियमों के अलावा किसी को भी आपके जीने के अधिकार हनन करने का कोई हक़ नहीं है, यानी आपकी जान ना तो पुलिस, ना तो कोई अधिकारी और ना प्रधानमंत्री और ना राष्ट्रपति और ना कोई और इंसान ले सकता है, आपको जीने की स्वतंत्रता है l


लेकिन इसी बीच जब हमारी नज़र सरकारी हॉस्पिटल में पड़े हुए कराहते हुए मरीजों पर पड़ती है, जो कभी डॉक्टर के अभाव में, तो कभी दवा के अभाव में तो कभी उपकारणो के अभाव में तो कभी करप्शन के कारण अपनी जान दे देने के लिए मज़बूर हो जाते हैं, आखिर ग़रीब जो हैं वो l


वही जब नज़र प्राइवेट हॉस्पिटल और महंगे प्राइवेट हॉस्पिटल की तरफ जाती है तो वहां भी हालत कुछ खास अच्छे नहीं लगते, इलाज के नाम पर पैसो का दोहन और मानव शरीर को कॉमऑडिटी यानी व्यापारिक वस्तु समझने का प्रयोग दिखता है, इस होड़ में जो पैसे वाला है वो जीत जाता है लेकिन जो पैसे से कमज़ोर है, वो ज़िन्दगी की जंग हारता हुआ नज़र आता है, और बदकिस्मती से अगर वो घर का कमाने वाला मुखिया है, तो उसके पीछे उसका सारा परिवार घोर टूटन में दिखता है.


क्या जीने का अधिकार का यहां पर हनन नहीं है, क्या ये राज्य की ज़िम्मेदारी नहीं है वो अपने निवासियों को एक जैसी स्वस्थ सुविधा मुहैया करवाए.


जबाब है कि है, बिल्कुल है, स्वास्थ्य का अधिकार अभी हमारे संविधान का हिस्सा है लेकिन ये मौलिक अधिकारों में नहीं आता, बल्कि राज्य के नीति निर्देशिक तत्वों मे आता है, और इन नीति निर्देशिक तत्वों की विडम्बना ये है कि इसपर सिर्फ राज्य सरकार ही कानून बना सकती है और सेंट्रल इसकी ज़िम्मेदारी और जवाबदेही से बाहर होती है, साथ ही साथ इन अधिकार का हनन होने पर हम कोर्ट का भी सहारा नहीं ले सकते हैं, जिसके वजह से सरकारी हॉस्पिटल कोर्ट के दायरे से बाहर चले जाते हैं. और सेंट्रल इसपर कोई ठोस कानून भी नहीं बना सकता जिसके कार्यान्वन के लिए हम न्यायलय का दरवाज़ा खटखटा सकें l


देश की जनता को एक तरह की स्वास्थ्य सुविधा नहीं मिलना और उसके लिए कहीं न्याय भी नहीं मिलना इसका एक मूल कारण है l


एक रिपोर्ट के अनुसार एक आम नागरिक का 25 प्रतिशत कमाई का हिस्सा स्वास्थ सुविधाओं के लिए खर्च होता है (एवरेज), यानी स्वास्थ सुविधाओं का असमान वितरण नागरिकों के गरीबी का एक मूल कारण है l


इसीलिए हमें अवाज़ उठानी चाहिए कि हमे
“RIGHT TO PUBLIC HEALTH” चाहिए.


सोशल मीडिया एक बड़ा प्लैटफॉर्म है इस तरह के दबे हुए मगर अति संवेदनशील मुद्दों को उठाने का और देश को जगाने का l

” इसलिए देश की यही पुकार, सबको मिले स्वास्थ का मौलिक अधिकार ”

– भास्कर अग्रवाल

हम हैं हेल्पिंग ह्यूमन, हम हैं आपकी आवाज

बेहद साधारण से लोगों का समूह जो आपके अधिकारों के लिए खड़ा होता है, जो ये चाहता है कि  आवाज बन पाए   उनका जो इस राजनीति की आपा धापी में सबसे अंत में खड़ा है.
ये बात तो ठीक है कि इस देश ने बहुत ऊंचे ऊंचे लोग पैदा किए, जिन्होने दुनिया में अपना और भारत का सर ऊंचा किया, हमने क्रिकेट में सर सचिन तेंदुलकर पैदा किया, हमने अपनी इंडिजीनियस सिस्टम से मिसाइल बनाने वाले कलाम पैदा किया, हमने गांधी पैदा किया कला में अमिताभ बच्चन पैदा किया.


लेकिन पिछले 70 वर्षों में हमने कोई राष्ट्रीय प्रगति नहीं की, हमारी उपलब्धि एक समूह के तौर पर कुछ भी नहीं है, हमारी देश की एक बड़ी आबादी आज भी अनपढ़ है, या फिर सिर्फ पढ़ना लिखना भर जानती है, क्या हमने हमेशा सिर्फ अपने अपने घरों के अंगान को साफ किया है, और कूड़ा उठाकर सड़को पर फेका है, क्या हमने सिर्फ दिवाली मे सिर्फ अपने घरों में दिए जलाए हैं, यही वो देश है जहां सिर पर मैला ढोने वाले भी मिल जाएंगे, खुद जुतकर हाथों से रिक्शा खींचने वाले मर्द भी मिल जायेगे और प्लेन उड़ाती हुई महिला भी मिल जाएगी, झारखंड में भूख से भात-भात कहकर मरती हुई बच्ची भी मिल जाएगी और और दुनिया के 10 नामी रईसों में दो तीन भारतीय नाम भी मिल जायेगे, यहां करोड़ों की कमाई करने वाले चपरासी भी मिलेगे और, मरने के बाद सम्पति के नाम पर कुछ किताबे और कपड़े, ऐसे प्रधान मंत्री भी मिल जायेगे.


लेकिन क्या इंसान के तौर पर या एक नागरिक के तौर पर हमने कोई प्रगति की है, क्या हम बगल वाले गली से आते हुए रोने की अवाज़ को घरों से बाहर निकलकर जानने और पहचान लेने की कोशिश की है?


शायद समाज की परिभाषाओं को हमने संकीर्ण बना दिया है, हम समाज सिर्फ अपने आस पास के दो चार लोगों को और ज़्यादा से पडोसी को लेकर समझते हैं, जबकि ये बात अटल है कि समाज बनाने के लिए हमे इंसान तो छोड़िए गाय, कुता, बकरी, और यहाँ तक कि ज़हर की भी अवश्‍यकता पड़ती है. याद रखिए एक बंद घड़ी भी चौबीस घंटे में दो बार सही समय दिखाती है.


जब हम मानवअधिकार की बात करते हैं तो उसमे बच्चे, बुज़ुर्ग, महिला, पुरुष, जवान अधेड़, हिजड़े सभी आते हैं, और इनमे से किसी एक के बिना भी समाज अपनी पूर्णता को नहीं पहुंचता. समाज के लिए समग्रता,सहजता, सरसंभावना, और समावेश होना ज़रूरी है.


आपलोगों से अग्रह है सभी को स्थान दीजिए देखिए ना, श्री राम ने तो केवट से भी दोस्ती की, शबरी के बैर खाए. हम भी थोड़ा प्रयास क्यों ना करे एक जिंदगी को दूसरे ज़िन्दगी के करीब लाने के लिए और सबके बराबरी के हक़ दिलवाने के लिए.
         क्या कहते हैं ?
तो कर सोंच पर चोट, सोंच बदलेगी तो हालात बदलेगे.

– भास्कर अग्रवाल, फॉअंडर हेलपिंग ह्यूमन

आखिर हम क्यों हेलपिंग ह्यूमन हैं, हम कौन लोग हैं, हम क्या चाहते हैं?

आखिर हम क्यों हेलपिंग ह्यूमन हैं, हम कौन लोग हैं, हम क्या चाहते हैं?

बेहद साधारण से लोगों का समूह जो आपके अधिकारों के लिए खड़ा होता है, जो ये चाहता है कि हम अवाज़ बन पाए  उस व्यक्ति का जो इस राजनीति की आपा धापी में सबसे अंत में खड़ा है.

ये बात तो ठीक है कि इस देश ने बहुत ऊंचे ऊंचे लोग पैदा किए जिन्होने दुनिया में अपना और भारत का सर ऊंचा किया, हमने क्रिकेट में सर सचिन तेंदुलकर पैदा किया, हमने अपनी इंडिजीनियस सिस्टम से मिसाइल बनाने वाले कलाम पैदा किया, हमने गांधी पैदा किया कला में अमिताभ बच्चन पैदा किया.

लेकिन पिछले 70 वर्षों में हमने कोई राष्ट्रीय प्रगति नहीं की, हमारी उपलब्धि एक समूह के तौर पर कुछ भी नहीं है, हमारी देश की एक बड़ी आबादी आज भी अनपढ़ है, या फिर सिर्फ पढ़ना लिखना भर जानती है, क्या हमने हमेशा सिर्फ अपने अपने घरों के अंगान को साफ किया है, और कूड़ा उठाकर सड़को पर फेका है, क्या हमने सिर्फ दिवाली मे सिर्फ अपने घरों में दिए जलाए हैं, यही वो देश है जहां सिर पर मैला ढोने वाले भी मिल जाएंगे, खुद जुतकर हाथों से रिक्शा खींचने वाले मर्द भी मिल जायेगे और प्लेन उड़ाती हुई महिला भी मिल जाएगी, झारखंड में भूक से भात भात कहकर मरती हुई बच्ची भी मिल जाएगी और और दुनिया के 10 नामी रईसों में दो तीन भारतीय नाम भी मिल जायेगे, यहां करोड़ों की कमाई करने वाले चपरासी भी मिलेगे और, मरने के बाद सम्पति के नाम पर कुछ किताबे और कपड़े, ऐसे प्रधान मंत्री भी मिल जायेगे.

लेकिन क्या इंसान के तौर पर या एक नागरिक के तौर पर हमने कोई प्रगति की है, क्या हम बगल वाले गली से आते हुए रोने की अवाज़ को घरों से बाहर निकलकर जानने और पहचान लेने की कोशिश की है?

शायद समाज की परिभाषाओं को हमने संकीर्ण बना दिया है, हम समाज सिर्फ अपने आस पास के दो चार लोगों को और ज़्यादा से पडोसी को लेकर समझते हैं, जबकि ये बात अटल है कि समाज बनाने के लिए हमे इंसान तो छोड़िए गाय, कुता, बकरी, और यहाँ तक कि ज़हर की भी अवश्‍यकता पड़ती है. याद रखिए एक बंद घड़ी भी चौबीस घंटे में दो बार सही समय दिखाती है.

जब हम मानवअधिकार की बात करते हैं तो उसमे बच्चे, बुज़ुर्ग, महिला, पुरुष, जवान अधेड़, हिजड़े सभी आते हैं, और इनमे से किसी एक के बिना भी समाज अपनी पूर्णता को नहीं पहुंचता. समाज के लिए समग्रता,सहजता, सरसंभावना, और समावेश होना ज़रूरी है.

आपलोगों से अग्रह है सभी को स्थान दीजिए देखिए ना, श्री राम ने तो केवट से भी दोस्ती की, शबरी के बैर खाए. हम भी थोड़ा प्रयास क्यों ना करे एक जिंदगी को दूसरे ज़िन्दगी के करीब लाने के लिए और सबके बराबरी के हक़ दिलवाने के लिए.

         क्या कहते हैं ?

तो कर सोंच पर चोट, सोंच बदलेगी तो हालात बदलेगे.