तुम पुरुष हो!

पिता – बेटी है… ठीक से परवरिश करना, दूसरे के घर जाना है। बेटियां दूसरे के घर की अमानत होती हैं।
बड़ी हो गई है बाहर थोड़ा कम जाने दो।
चाल-चलन में शालीनता होनी चाहिए।
इतनी बड़ी हो गई है, दुपट्टा लगाना चाहिए।
शादी के लायक हो रही है, इसे घर के कामकाज सिखा दो।
(मां हर बात पर कह देती है – “हां, ठीक है…” क्योंकि वह भी इससे गुजरकर आई है…)

भाई – कहां जा रही हो? कहां से आ रही हो?
इतनी देर कहां हो गई? उस सहेली के साथ मत जाओ, वो अच्छी नहीं है।
इतनी टाइट जींस क्यों पहन रखी है?
कॉलेज के गेट पर कबसे खड़ा था, क्या कर रही थी? तुम्हारी क्लास तो दो बजे ओवर हो जाती है।
अब तुम्हारी पढ़ाई-लिखाई बंद। बहुत हो गया।
उस लड़के से बात क्यों कर रही थी? पढ़ने जाती हो या बात करने?
तुम्हारा दिमाग खराब हो गया, अब तुम्हें घर से निकलने नहीं देंगे।
मां कल मेरे दोस्त आने वालो हैं, इससे कहना अच्छे सलीके के कपड़े पहनकर रहे।
इसकी शादी मेरी पसंद से ही होगी।
(मां कहती है- “हां, ठीक है!” क्योंकि वह इससे गुजर चुकी होती है…)

पति – सुबह समय से उठ जाना, नहीं तो घर वाले नाराज़ होने लगेंगे।
सोते समय सबका पैर दबाकर सोना।
कल वो वाली साड़ी पहन लेना… मेरे दोस्त खाने पर आने वाले हैं, कुछ ऊटपटांग मत पहन लेना।
घर से बाहर मत निकलना, बिना किसी को लिए…सर पे पल्लू रखकर ही बाहर निकलना…
खाना नहीं बनाने आता तो सीख लो… नहीं तो भाभियां मेरा मजाक उड़ाएंगी, मेरी नाक कट जाएगी।
मेरे कपड़े नहीं मिल रहे हैं! मेरी घड़ी नहीं मिल रही है! मेरी फाइल कहां है? कार की चाभी दे दो, देर हो रही है!
(पत्नी हर बात पर कहती है- “ठीक है…” क्योंकि वह आज तक यही देखती आई है…)

बेटा – मां, मेरा काम नहीं हुआ तुम्हारी वजह से, तुम देर नहीं करती… मैं समय से पहुंच जाता तो हो गया होता।
आजकल रात भर खटर-पटर करती रहती हो, न खुद सोती हो, न दूसरों को चैन से सोने देती हो।
आरती कह रही थी, तुमने बच्चों को सिर चढ़ा रखा है। बच्चे तुम्हारी वजह से बिगड़ रहे हैं।
ज्यादा दुखी मत करो, नहीं तो वृद्धाश्रम जाना पड़ेगा…
(मां बोलती है- “ठीक है बेटा, तुम्हारी मर्जी…”)  

– शालिनी श्रीनेत 

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